Sunday, February 8, 2009

फिर वही शाम


फिर शाम के रंग बिखरने लगे है


इन आँखों में सपने सजने लगे है


हर शाम के रंगों में कुछ ऐसा नूर है


की महसूस सब पास होता है जो कुछ भी दूर है


हर शाम यादों का खजाना सा लगता है


इसमे दीखता हर साया कुछ पहचाना सा लगता है


सिन्दूरी छठा जब बिखर जाती है


यादों की दुनिया में हलचल सी मच जाती है


उन यादों की उठा पटक कुछ यूँ कर जाती है


की धीमे धीमे से मेरी दुनिया फिर रोशन कर जाती है


.......................................................शायद


इसीलिए हर शाम मुझे सुहाती है ,


जाते जाते भी मेरे दिल में शमा जला जाती है ।


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